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Monday, April 30, 2012

अगर शत-प्रतिशत मतदान होते तो.....

                                                        अगर शत-प्रतिशत मतदान होते तो.....

                                                        आर.एस.शर्मा ‘नागेश’

अब से कुछ वर्ष पूर्व तक होने वाले किसी भी चुनाव में मत प्रतिशत का कम होना राजनैतिक पार्टियों के लिए सुखद साबित होता रहा है। चुनावों में वोटरों के उसी चुनावी रुझान के प्रतिशत के आधार पर कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस या अन्य विशेष पार्टी ही बहुमत से विजयी होती रही है। कारण स्पष्ट है कि उसी प्रतिशत होने वाले मतदाताओं में मतदाता अपनी-अपनी दलीय निष्ठा के तहत अपने दल को समर्थन देकर जिताने की कोशिश करते हैं। अन्य वोटरांे के कुछ प्रतिशत जमा और घटा का अंतर बड़े-बड़े उल्टफेर करने में सहायक सि( होता रहा है। हां! इसमें कभी-कभी चलने वाली किसी भी प्रकार की सहानुभूति लहर भी कारगर सि( होती रही है मगर वह भी बहुत कम।
पिछले कुछ अरसे से मतदान का प्रतिशत बढ़ने लग गया है। यह बढ़ने वाला मत प्रतिशत किसी दबाव के अंतर्गत सामने नहीं आ रहा बल्कि युवा पीढ़ी ने लोकतंत्र की परिभाषा को साकार करने के लिए पहल करनी शुरु कर दी है। यह जो बड़ा हुआ मतदान है यह न कांग्रेस के लिए होता है और न ही भाजपा या किसी अन्य दल के लिए बल्कि यह मतदान ऐसे विशेष मतदाताओं के जहन में एक सवाल खड़ा करता है कि उम्मीदवार का स्तर क्या है? क्या वह पढ़ा-लिखा है, क्या वह समाज के हित में काम करेगा? क्या इसने चुनावी टिकट लेते समय कुछ ऐसा अनैतिक कार्य तो नहीं किया जिसका उसने बाद में लाभ उठाना है इत्यादि-इत्यादि। जब ऐसे मतदाता इस प्रकार की मानसिकता को लेकर वोट देने लग जाते हैं तब तो उनसे कोई भी राष्ट्रीय और राज्यीय दल चारों खाने चित्त हो सकता है। आज स्वतंत्र उम्मीदवार ज्यादा जीतने लग गए हैं। कारण स्पष्ट है कि मतदाताओं का बदलता रुझान और लीक से हटकर वोट देने वालों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या।
अभी तो यह कुछ प्रतिशत होने वाले मतदान के परिणाम हैं। सच्चाई यह है कि न चुनाव आयोग और न ही सरकार मतदान के प्रति कभी गंभीर थी और न कभी होगी सिवाय चुनावी औपचारिकता निभाने के, जो आज तक निभाई जा रही है। सरकार और चुनाव आयोग इस सत्य को भली-भांति जानता है कि यदि शत-प्रतिशत मतदान अनिवार्य कर दिया जाए तो राष्ट्रीय दल दिखाई भी नहीं देंगे क्योंकि मौजूदा मतदाताओं का प्रतिशत केवल वर्तमान राष्ट्रीय और राज्यीय दलों को जिताने भर से जुड़ा हुआ है। आज अगर शत-प्रतिशत मतदान की अनिवार्यता बन जाती है तो मतदाताआंे का नया प्रतिशत जो कि पुराने प्रतिशत से ज्यादा होगा। पुरानी चुनावी कार्यशैली और परिणामों पर भारी पड़कर लोकतंत्र के निर्माण में कारगर सि( हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो वर्तमान दलों के सारे मंसूबे, सारे सपने धरे के धरे रह जायेंगे। कुछ समय बाद नए दल बनेंगे जो राष्ट्रीयता, निष्ठा और समाज सेवा के पर्याय सि( हो सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण में सहायक सि( हो सकते हैं और फिर पुराने दागियों, बागियों को सबक सिखा सकते हैं। चुनावी टिकट प्राप्त करने में लाखों- करोड़ों रुपए देने वाले से समाज सेवा की कभी अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे उम्मीदवार 10 लाख लगाकर एक करोड़ कमाने की जुगत में रहेंगे। मतदान का प्रतिशत बढ़ जाने पर स्वतंत्र उम्मीदवारों की संख्या बढ़ जाएगी। हो सकता है कुछ समय तक उनमें आपसी एका न होने पर समस्याएं भी उत्पन्न हों परन्तु बाद में वही सुराज की स्थापना के लिए सहायक सि( हो सकते हैं। आज सख्त जरुरत है शत-प्रतिशत मतदान व्यवस्था लागू करने की। उन मतदाताओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की, जुर्माना लगाने की जो मतदान में हिस्सा नहीं लेते, भले ही इसका कारण कुछ भी रहे।

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