400,000000,0000000 रुपये विदेशी बैंकों में भारतीय धन पड़ा सड़ रहा है और भारतीय मुद्रा होने के बावजूद भी उसकी उपयोगिता भारत के लिए कुछ भी नहीं। यदि यही धन भारत में वापिस आ जाए तो कल्पना करना ही अचंभित कर सकता है कि दुनिया में भारतवर्ष कितनी बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकता है। 125,0000000 जनसंख्या वाले देश भारत का यदि 400 लाख करोड़ धन प्रचलन से बाहर हो, बेकार कर दिया गया हो, उसको वापिस लाने के प्रयास भी कभी न किए जा रहे हों तो इस गैर जिम्मेदाराना आचरण के लिए किसे दोषी माना जा सकता है, जनता को या सरकार को। सरकार इस राशि को लाने में अनिच्छुक है और यदि कुछ राष्ट्र भक्त एकजुट होकर सरकार पर इसको वापिस मंगवाने और उसे राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करने के लिए प्रयास करते हैं तो उन्हें सरकारी तौर पर कुचलने-बदनाम करने का प्रयास शुरू हो जाता है।
अन्ना हजारे ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति विरोध का अलख जगाया, सरकार घबरा गई। बाबा रामदेव ने 400 लाख करोड़ रुपए का विदेशों मंे सड़ रहा काला धन देश में वापिस मंगवाने के लिए मुहिम छेड़ा, आंदोलन प्रारंभ किया तो सरकार परेशान हो गई। आखिर अन्ना और रामदेव के इन प्रयासों से अन्ना और रामदेव को क्या व्यक्तिगत लाभ मिल सकता है। थोड़ी शोहरत, लोकप्रियता, नेकनामी बस और कुछ नहीं। यदि इस कीमत पर देश और देशवासियों को अकूत सम्पदा वापिस पाने और भविष्य में जनलोकपाल बिल द्वारा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सफलता प्राप्त होती है तो देश के कर्णधारों को इनके प्रयासों की सराहना करनी चाहिए थी, उनके साथ सहयोग करते हुए उनके द्वारा देशहित में उठाए गए कदमों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए था। आखिर इन नेक कामों में अड़चनें क्यों डल रही हैं। यह सत्य है कि देशवासी मूर्ख नहीं हैं परन्तु उन्हें मूर्ख समझकर बहलाया-फुसलाया जा रहा है जो एक सीमा तक ही फलदायी हो सकता है।
बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में आंदोलन नितांत शांतिप्रिय था। सरकार और बाबा रामदेव के अंदर क्या सांठ-गांठ थी इससे जनता को कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं है। भले ही अन्ना और रामदेव के मुद्दे एक हों और विरोध स्वर अलग-अलग, उससे भी जनता को कोई सरोकार नहीं। जनता को यदि कोई सरोकार है तो वह मात्र इतना कि वे भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से आज़िज आ चुकी है। उन्हें समाप्त करना अब आवश्यक बन गया है। इसके लिए यदि कोई भी सकारात्मक प्रयास करने की कोशिश करेगा तो जनता उसके साथ जुड़ती चली जाएगी। अन्ना के जन लोकपाल बिल मामले में जो हो रहा है, जनता सब जानती है। सिर्फ सही समय का इंतजार कर रही है। रामलीला ग्रांउड में अंधेरी रात में जो हुआ उसे भी न केवल देश की जनता ने देखा बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान में लिया और आवश्यक कार्यवाही शुरू कर दी।
इस सरकार की कार्यशैली, नीति और व्यवस्था पिछले दो सालों में खतरनाक स्तर और देश विरोधी साबित हो रही हैं। लाखों-करोड़ों के घोटाले सामने आए हैं। अनेक बड़े-बड़े नेता आज भी घोटालों में लिप्त हैं, मुकदमों में फंसे हुए हैं। यह अलग बात है कि नेताआंे को शायद उड़न छू होने का वरदान मिला हुआ है इसलिए कोई भी सजा नहीं पाता। मुकदमों को सालों-साल लग जाते हैं और परिणाम शून्य। शिबू सोरेन जैसा नेता आजीवन कारावास की सजा पाने के बावजूद भी बहाल होकर मुख्यमंत्री बन जाता है परन्तु भूखे ;अनशन परद्ध और सोए हुए बाबा जी के सहयोगी आंदोलनकारियों पर रात के अंधेरे में लाठीचार्ज और गोलियां चला दी जाती हैं जबकि वह आंदोलन कुछ घंटे पहले ही शांतिपूर्वक रुप से अस्तित्व में था। इस पर तुर्रा यह कि सरकार इसे अनुचित नहीं मानती और की गई कार्यवाही को सही ठहराती है।
देशवासी पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था से तंग आ चुके हैं, उसे बदलने पर उतारु हैं तो उसमें रुकावट क्यों? व्यवस्था परिवर्तन के जो और जिस प्रकार के दंश आज देश और देशवासी झेल रहे हैं आने वाले समय में सुखद परिणामों के द्योतक नहीं माने जा सकते।
शक्ति टाइम्स, दिल्ली साप्ताहिक अंक 24, 12-18 जून 2011 में संपादकीय प्रकाशित
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