शिष्टाचार में बदलता आज भ्रष्टाचार
कभी देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने अपने एक बयान में कुछ ऐसा ही कहा था कि विभिन्न योजनाओं में खर्च होने वाला प्रत्येक रुपए का मात्र 15 पैसे ही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है बाकी सब इधर-उधर ही बंट जाते हैं। यह लगभग एक दशक पुरानी बात है। यदि उस समय यह बात सच थी तो आज तो एक रुपये में से मात्र 5-7 पैसे ही अपने लक्ष्य तक पहुंचते होंगे बाकी सब इधर-उधर हो जाते होंगे। सच्चाई यह है कि आज से कुछ दशक पूर्व जिसे देश और समाज में भ्रष्टाचार का नाम दिया जाता था अब वह शिष्टाचार में बदल चुका है। पहले भ्रष्टाचार एक बुराई के तौर पर बुरी निगाहों से देखा जाता था मानो कोई आपराधिक कार्य हो और नैतिकता के विरु( उठाया गया कोई अनैतिक कार्य हो परन्तु अब वही अनैतिकता की परिभाषा काफी हद तक बदल गई है और इसे बदलने में मुख्यतः सरकारी तंत्र का बहुत बड़ा हाथ है। कानून कुछ रुपए रिश्वत लेने या देने वाले के खिलाफ सजा भी मुकर्रर कर देता है परन्तु लाखांे-करोड़ों हजम करने वाले बड़ी सफाई और खूबसूरती से बच जाते हैं। बड़े-बड़े नामी-गरामी नेताओं और मंत्रियों पर तो कानून भी हाथ डालने से डरता है। वह शायद इसलिए डरता है कि उसमंे उलझने से कहीं उनके ऊपर दाग न लग जाए या उनके हाथ काले न हो जाएं। पहले भ्रष्टाचारियों को हीन भावना और बुराई की निगाहों से देखा जाता था परन्तु अब पैसे की माया इतनी बढ़ गई है कि उन्हें सम्मान की निगाहों से देखा जाने लगा है। भ्रष्टाचारी भी निगाहें झुकाकर चलने के बदले शान से सिर उठाकर चलने में गौरव समझते हैं मानो शिष्टाचारियों को चिढ़ा रहे हों कि हम यह हैं और तुम क्या हो?
आज भ्रष्ट जाने वाला आचरण शिष्ट बनता जा रहा है। भ्रष्टाचार की आधुनिक परिभाषा अब शिष्टाचार के नाम पर लेन-देन और घोटाले बन गए हैं। करोड़ों-लाखों की रकमें डकारने के बाद भी भ्रष्टाचारी सीनाजोरी दिखाने में बाज नहीं आते। यदि उन्हें लगता है कि उन पर किसी प्रकार की आंच आने वाली है तो तत्काल ही ऐसे भ्रष्टाचारी मामले को उलझाने के लिए कुछ ऐसे लोगांे को फंसाने की कोशिश करते हैं जिनका भ्रष्टाचार के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है।
मौजूदा हालातों में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मुख्य आरोपी ए.राजा की इस घोटाले में संलिप्पता किसी से छुपी नहीं है। यह घोटाला आज के समय की सुर्खियां बन चुका है। सीबीआई को बड़े ही पापड़ बेलने पड़े तब ए.राजा पर कोई कार्यवाही हो सकी। मजबूरियां कुछ भी रही हों परन्तु सच्चाई तो यही है कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को 1,76000 करोड़ से भी ज्यादा का चूना लग चुका है। अभी पूरी आंकड़े सामने नहीं आए, सच्चाई चरमसीमा पर नहीं पहुंची कि सरकार के एक मंत्री राजा के बचाव में सीएजी रिर्पोट को भी झूठा साबित करने में तुल गए। परोक्ष में उन्होंने भी इस सच्चाई को जनता में माना कि इस घोटाले में सरकार को कई हजार करोड़ का चूना लगा है।
भ्रष्टाचार कहां नहीं है। आज देश में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार फैला हुआ है। जितनी भी सरकारी योजनाएं जनहित के लिए अमल में आयी हैं उनमें भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार सामने आया है। मनरेगा हो या फिर बीआरईजीएस, लाडली हो या कोई अन्य, सभी में
योजनाओं का लाभ उठाने वालों को कुछ न कुछ प्रतिशत का चढ़ावा चुकाना ही पड़ता है। यही कुछ प्रतिशत एक से दूसरी जगह तक और दूसरी से तीसरी और ऐसे ही क्रमशः आगे बढ़ते-बढ़ते 7 प्रतिशत का चढ़ावा बहुत आगे बढ़कर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। आए दिन जनहित में नई-नई योजनाएं सरकार अमल में लाने में जुटी हुई है परन्तु जनहित में उनका उपयोग कम होता है और भ्रष्टाचारियों की जेबें गर्म करने में सुविधाओं पर खर्च किया जाने वाला लगभग 50 प्रतिशत धन खर्च हो जाता है। योजनाएं बनाने से पहले उनके अमल पर जब तक पारदर्शी खाका नहीं बनेगा तब तक उन योजनाओं का सही लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। भ्रष्टाचार से शिष्टाचार के मुकाम तक पहुंचने वाला आचार, व्यवहार दुराचार में बदलता रहेगा।
कभी देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने अपने एक बयान में कुछ ऐसा ही कहा था कि विभिन्न योजनाओं में खर्च होने वाला प्रत्येक रुपए का मात्र 15 पैसे ही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है बाकी सब इधर-उधर ही बंट जाते हैं। यह लगभग एक दशक पुरानी बात है। यदि उस समय यह बात सच थी तो आज तो एक रुपये में से मात्र 5-7 पैसे ही अपने लक्ष्य तक पहुंचते होंगे बाकी सब इधर-उधर हो जाते होंगे। सच्चाई यह है कि आज से कुछ दशक पूर्व जिसे देश और समाज में भ्रष्टाचार का नाम दिया जाता था अब वह शिष्टाचार में बदल चुका है। पहले भ्रष्टाचार एक बुराई के तौर पर बुरी निगाहों से देखा जाता था मानो कोई आपराधिक कार्य हो और नैतिकता के विरु( उठाया गया कोई अनैतिक कार्य हो परन्तु अब वही अनैतिकता की परिभाषा काफी हद तक बदल गई है और इसे बदलने में मुख्यतः सरकारी तंत्र का बहुत बड़ा हाथ है। कानून कुछ रुपए रिश्वत लेने या देने वाले के खिलाफ सजा भी मुकर्रर कर देता है परन्तु लाखांे-करोड़ों हजम करने वाले बड़ी सफाई और खूबसूरती से बच जाते हैं। बड़े-बड़े नामी-गरामी नेताओं और मंत्रियों पर तो कानून भी हाथ डालने से डरता है। वह शायद इसलिए डरता है कि उसमंे उलझने से कहीं उनके ऊपर दाग न लग जाए या उनके हाथ काले न हो जाएं। पहले भ्रष्टाचारियों को हीन भावना और बुराई की निगाहों से देखा जाता था परन्तु अब पैसे की माया इतनी बढ़ गई है कि उन्हें सम्मान की निगाहों से देखा जाने लगा है। भ्रष्टाचारी भी निगाहें झुकाकर चलने के बदले शान से सिर उठाकर चलने में गौरव समझते हैं मानो शिष्टाचारियों को चिढ़ा रहे हों कि हम यह हैं और तुम क्या हो?
आज भ्रष्ट जाने वाला आचरण शिष्ट बनता जा रहा है। भ्रष्टाचार की आधुनिक परिभाषा अब शिष्टाचार के नाम पर लेन-देन और घोटाले बन गए हैं। करोड़ों-लाखों की रकमें डकारने के बाद भी भ्रष्टाचारी सीनाजोरी दिखाने में बाज नहीं आते। यदि उन्हें लगता है कि उन पर किसी प्रकार की आंच आने वाली है तो तत्काल ही ऐसे भ्रष्टाचारी मामले को उलझाने के लिए कुछ ऐसे लोगांे को फंसाने की कोशिश करते हैं जिनका भ्रष्टाचार के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है।
मौजूदा हालातों में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मुख्य आरोपी ए.राजा की इस घोटाले में संलिप्पता किसी से छुपी नहीं है। यह घोटाला आज के समय की सुर्खियां बन चुका है। सीबीआई को बड़े ही पापड़ बेलने पड़े तब ए.राजा पर कोई कार्यवाही हो सकी। मजबूरियां कुछ भी रही हों परन्तु सच्चाई तो यही है कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को 1,76000 करोड़ से भी ज्यादा का चूना लग चुका है। अभी पूरी आंकड़े सामने नहीं आए, सच्चाई चरमसीमा पर नहीं पहुंची कि सरकार के एक मंत्री राजा के बचाव में सीएजी रिर्पोट को भी झूठा साबित करने में तुल गए। परोक्ष में उन्होंने भी इस सच्चाई को जनता में माना कि इस घोटाले में सरकार को कई हजार करोड़ का चूना लगा है।
भ्रष्टाचार कहां नहीं है। आज देश में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार फैला हुआ है। जितनी भी सरकारी योजनाएं जनहित के लिए अमल में आयी हैं उनमें भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार सामने आया है। मनरेगा हो या फिर बीआरईजीएस, लाडली हो या कोई अन्य, सभी में
योजनाओं का लाभ उठाने वालों को कुछ न कुछ प्रतिशत का चढ़ावा चुकाना ही पड़ता है। यही कुछ प्रतिशत एक से दूसरी जगह तक और दूसरी से तीसरी और ऐसे ही क्रमशः आगे बढ़ते-बढ़ते 7 प्रतिशत का चढ़ावा बहुत आगे बढ़कर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। आए दिन जनहित में नई-नई योजनाएं सरकार अमल में लाने में जुटी हुई है परन्तु जनहित में उनका उपयोग कम होता है और भ्रष्टाचारियों की जेबें गर्म करने में सुविधाओं पर खर्च किया जाने वाला लगभग 50 प्रतिशत धन खर्च हो जाता है। योजनाएं बनाने से पहले उनके अमल पर जब तक पारदर्शी खाका नहीं बनेगा तब तक उन योजनाओं का सही लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। भ्रष्टाचार से शिष्टाचार के मुकाम तक पहुंचने वाला आचार, व्यवहार दुराचार में बदलता रहेगा।
शक्ति टाइम्स दिल्ली साप्ताहिक के अंक 8, 20-26 फरवरी 2011 में प्रकाशित
No comments:
Post a Comment